अजय शास्त्री (वरिष्ठ पत्रकार व संपादक)
बीसीआर न्यूज़/नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला लेते हुए कहा कि किसी बच्चे का यह जानना कि उसका जैविक पिता कौन है, उसकी पहचान व सम्मान से जुड़ा होने के साथ साथ कानूनी अधिकारों से भी जुड़ा सवाल है.
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में लेते हुए साफ कहा है कि किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा या बदनामी का डर, बच्चों के अपने असली पिता को जानने के अधिकार से बड़ा नहीं हो सकता. कोर्ट ने कहा कि इज्जत बचाने के लिए सच पर पर्दा नहीं डाला जा सकता और बड़े लोगों की गलतियों की सजा बच्चों को नहीं दी जा सकती.
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि किसी बच्चे का यह जानना कि उसका जैविक पिता कौन है. उसकी पहचान, सम्मान और कानूनी अधिकारों से जुड़ा सवाल है. ऐसे मामलों में समाज क्या सोचेगा या किसी की छवि पर क्या असर पड़ेगा. यह बच्चों के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकता.
एक महिला ने फैमिली कोर्ट में दावा किया था कि वह कई साल तक एक व्यक्ति के साथ पति-पत्नी की तरह रही और इस रिश्ते से तीन बच्चों का जन्म हुआ. महिला ने बच्चों के भरण-पोषण की मांग की. लेकिन उस व्यक्ति ने महिला और बच्चों से किसी भी तरह का रिश्ता होने से इनकार कर दिया.
महिला और बच्चों ने कोर्ट में परिवार की तस्वीरें, स्कूल रिकॉर्ड, राशन कार्ड, वोटर कार्ड और गवाहों के बयान पेश किए. जिनमें उस व्यक्ति को बच्चों का पिता बताया गया था. इन सबूतों के आधार पर फैमिली कोर्ट ने डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया.
उस व्यक्ति ने हाईकोर्ट में दलील दी कि डीएनए टेस्ट सिर्फ उसके परिवार को बदनाम करने के लिए कराया जा रहा है. उसने कहा कि इससे उसकी पत्नी और परिवार की प्रतिष्ठा पर असर पड़ेगा इसलिए टेस्ट पर रोक लगाई जाए.
आपको बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट ने इस दलील को मानने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि अगर दो वयस्क अपने फैसलों से किसी रिश्ते में आते हैं और उससे बच्चे पैदा होते हैं. तो बाद में कोई एक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता. उसके फैसलों का बोझ बच्चों पर नहीं डाला जा सकता.
कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून किसी को यह छूट नहीं दे सकता कि वह अपने अधिकारों की बात तो करे लेकिन अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ ले. अगर पितृत्व को लेकर गंभीर विवाद है और शुरुआती सबूत मौजूद हैं. तो सच्चाई सामने लाने के लिए डीएनए टेस्ट जरूरी हो सकता है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि बच्चे की पहचान सिर्फ भावनात्मक मुद्दा नहीं है. इससे उसके भरण-पोषण, कानूनी अधिकार और भविष्य भी जुड़े होते हैं. इसलिए किसी वयस्क के सामाजिक शर्मिंदगी के डर की वजह से बच्चों को जिंदगी भर अपनी पहचान से वंचित नहीं रखा जा सकता.
आगे दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा बच्चों ने अपने जन्म की परिस्थितियां नहीं चुनीं. इसलिए बड़ों के फैसलों की कीमत उन्हें नहीं चुकानी चाहिए. किसी की प्रतिष्ठा, बच्चों के सच जानने के अधिकार पर भारी नहीं पड़ सकती.
