अजय शास्त्री (संपादक व प्रकाशक)
बीसीआर न्यूज़/नई दिल्ली: आज फिर वही सुबह थी — स्कूल की घंटी, बच्चों की चहल-पहल और छोटी-छोटी आवाज़ों में गूँजती पढ़ाई। मैं जब कक्षा में पहुँची तो कुछ बच्चे पहले से ही अपनी कॉपियाँ खोलकर बैठ गए थे। किसी को नई कविता सुनानी थी, तो कोई जल्दी-जल्दी अपना होमवर्क पूरा कर रहा था।
प्राथमिक कक्षा के बच्चे बहुत मासूम होते हैं। उनके लिए स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि एक नई दुनिया होती है। यहाँ वे अक्षर पहचानते हैं, गिनती सीखते हैं और साथ ही दोस्ती, अनुशासन और सहयोग जैसे जीवन के महत्वपूर्ण पाठ भी सीखते हैं।
आज एक छोटा सा बच्चा मेरे पास आया और बोला, “मैम, मैंने पहली बार खुद से पूरा वाक्य पढ़ लिया।” उसकी आँखों की चमक देखकर मुझे लगा कि शिक्षक होने का असली सुख ऐसे ही पलों में छिपा है।
सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में कई बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं जहाँ शिक्षा के साधन सीमित होते हैं। ऐसे में शिक्षक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हमें केवल किताबें नहीं पढ़ानी होतीं, बल्कि बच्चों में आत्मविश्वास भी जगाना होता है।
दिन के अंत में जब बच्चे “नमस्ते मैम” कहकर घर लौटते हैं, तो मन में एक संतोष होता है कि आज फिर हमने किसी छोटे से सपने को थोड़ा और आगे बढ़ाने में मदद की।
शायद इसी कारण शिक्षक का पेशा केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी और सेवा भी है। क्योंकि आज जिन छोटे हाथों में पेंसिल है, कल वही हाथ देश का भविष्य लिखेंगे।
