June 5, 2026
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सुप्रीम कोर्ट कोर्ट नंबर 1 में W.P.(C) No. 322/2026 पर हुई महत्वपूर्ण सुनवाई — शिक्षा बजट बढ़ाने, सिख विरासतों की सुरक्षा एवं सार्वजनिक संपत्तियों पर अवैध कब्जों का मुद्दा उठा

अजय शास्त्री (वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक)

बीसीआर न्यूज़/नई दिल्ली: आज भारत के सर्वोच्च न्यायालय के कोर्ट नंबर 1 में माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय एवं दो अन्य माननीय न्यायाधीशों की तीन सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं दैनिक रुस्तम-ए-हिंद समाचार पत्र के संपादक सरदार चरणजीत सिंह ने जनहित याचिका संख्या W.P.(C) No. 322/2026 में याचिकाकर्ता-इन-पर्सन के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं राष्ट्रीय मुद्दों को उठाया।

सुनवाई के दौरान चरणजीत सिंह ने भारत के बच्चों की शिक्षा, खालसा सिख पंथ की ऐतिहासिक विरासतों, गुरुद्वारों एवं धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा तथा देशभर में सार्वजनिक एवं धार्मिक संपत्तियों पर कथित अवैध कब्जों का मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखा।

चरणजीत सिंह ने न्यायालय को बताया कि भारत सरकार देश के विद्यार्थियों पर अत्यंत कम सार्वजनिक व्यय कर रही है, जो लगभग 1.4 प्रतिशत के आसपास बताया जाता है, जबकि विकसित राष्ट्र शिक्षा पर कहीं अधिक निवेश करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि भारत को वास्तविक रूप से विकसित, वैज्ञानिक एवं संवैधानिक राष्ट्र बनाना है, तो शिक्षा पर न्यूनतम 5 प्रतिशत से अधिक राष्ट्रीय निवेश सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि देश के अनेक विद्यार्थी संसाधनों, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं समान अवसरों के अभाव में अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित हो रहे हैं।

सुनवाई के दौरान चरणजीत सिंह ने खालसा सिख पंथ की ऐतिहासिक धरोहरों, गुरुद्वारों एवं विरासत स्थलों की सुरक्षा का विषय भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने न्यायालय को अवगत कराया कि भारत सहित विभिन्न देशों में अनेक ऐतिहासिक सिख विरासत स्थलों एवं धार्मिक संपत्तियों पर कथित रूप से अवैध कब्जे, राजनीतिक हस्तक्षेप तथा व्यावसायिक उपयोग के प्रयास हो रहे हैं, जिससे खालसा पंथ की सामूहिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को खतरा उत्पन्न हो रहा है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ धार्मिक संस्थाओं एवं प्रबंधन समितियों द्वारा “गुरु की गोलक” एवं धार्मिक संसाधनों का उपयोग जनहित एवं धार्मिक संरक्षण के बजाय राजनीतिक गतिविधियों में किया जा रहा है, जिसकी स्वतंत्र जांच एवं पारदर्शिता आवश्यक है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चरणजीत सिंह ने अत्यंत आदरपूर्वक कहा:

“माई लॉर्ड, मेरा नाम सरदार चरणजीत सिंह है। मैं जनहित याचिका संख्या W.P.(C) No. 322/2026 में याचिकाकर्ता-इन-पर्सन के रूप में आपके समक्ष उपस्थित हुआ हूँ।
यह मामला केवल एक सामान्य विवाद नहीं, बल्कि भारत के बच्चों के भविष्य, उनकी शिक्षा, बौद्धिक उन्नति तथा भारत के सर्वांगीण संवैधानिक विकास से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण जनहित का विषय है।”

उन्होंने आगे बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान की सफलता उन लोगों की निष्ठा एवं ईमानदारी पर निर्भर करती है जो उसे लागू करते हैं।

लगभग 20 मिनट तक अपनी बात रखने के उपरांत माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता पहले शिक्षा संबंधी संसदीय समिति एवं संबंधित सक्षम प्राधिकरणों के समक्ष अपना विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करें। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि उचित कार्रवाई नहीं होती है, तो याचिकाकर्ता पुनः सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखा सकते हैं।

इस पर चरणजीत सिंह ने न्यायालय को बताया कि संबंधित संस्थाओं एवं विभागों को पूर्व में भी शिकायतें एवं ज्ञापन दिए जा चुके हैं, तथापि न्यायालय के सुझाव का सम्मान करते हुए वह पुनः संसदीय शिक्षा समिति के समक्ष अपना पक्ष रखेंगे।

उन्होंने स्पष्ट कहा:

“यदि भारत के विद्यार्थियों, शिक्षा व्यवस्था और खालसा सिख विरासतों की रक्षा हेतु प्रभावी कार्यवाही नहीं हुई, तो हम पुनः भारत के सर्वोच्च न्यायालय तथा आवश्यकता पड़ने पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों एवं मानवाधिकार मंचों का भी दरवाज़ा खटखटाएँगे।”

चरणजीत सिंह द्वारा पूर्व में जारी “खालसा सिख पंथ की भूमि, संपत्ति, विरासत एवं ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा एवं अविभाज्य सामूहिक स्वामित्व” संबंधी अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक नोटिस का भी इस संदर्भ में उल्लेख किया गया, जिसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अन्य देशों में स्थित ऐतिहासिक सिख संपत्तियों को खालसा पंथ की सामूहिक विरासत बताते हुए उनकी बिक्री, हस्तांतरण अथवा व्यावसायिक उपयोग को अवैध घोषित करने की मांग की गई थी।

इस प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से सभी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, मानवाधिकार संगठनों, धार्मिक निकायों, मीडिया संस्थानों एवं सरकारों से अपील की जाती है कि वे शिक्षा, सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक स्वतंत्रता एवं अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा हेतु संवैधानिक एवं मानवीय दायित्व निभाएँ।

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