अजय शास्त्री (संपादक)
बीसीआर न्यूज़/निशा सिंह, नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हैदराबाद में देशवासियों से आर्थिक चुनौतियों के दौर में संयम और बचत अपनाने की अपील की हैं। उन्होंने पेट्रोल डीजल की खपत कम करने, वर्क फ्रॉम होम करने,सार्वजनिक परिवहन, विदेशी यात्राओं से बचने, एक साल तक सोने की खरीद रोकने और स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देने की अपील की हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि कठिन समय में जिम्मेदार नागरिक बनकर देशहित में योगदान देना भी देशभक्ति है। प्रधानमंत्री की इन बातों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि कोविड काल में वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन बैठकों के चलते ईंधन खर्च में काफी कमी आई थी। इसी माडल को फिर अपनाने की बात प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि सार्वजनिक परिवहन के अधिक उपयोग से पेट्रोल डीजल की बचत संभव है। वहीं, किसानों में प्राकृतिक खेती और सोलर पंप को बढ़ावा देने से डीजल तथा रासायनिक खाद पर होने वाले खर्च कम किये जा सकते हैं। देशहित के नजरिए से ये सभी कदम सही माने जा सकते हैं। लेकिन, इस अपील के साथ ही कई सवाल भी उठना लाजिमी है। क्या सबसे पहले वीआईपी संस्कृति में चल रहे भारी-भरकम गाड़ियों के काफिलों पर रोक नहीं लगनी चाहिए? क्या नेताओं और बड़े अधिकारियों के बार-बार होने वाले विदेशी दौरों, लग्जरी व्यवस्थाओं और सरकारी खर्चों में कटौती नहीं होनी चाहिए? देश ने पहले भी संकट के समय सामूहिक जिम्मेदारी निभाई है।
(1965 में खाद्यान्न संकट के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने पहले स्वयं और फिर अपने परिवार में सप्ताह में एक दिन उपवास रखा)
1965 के भारत-पाक युद्ध और खाद्यान्न संकट के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की थी। उन्होंने पहले स्वयं और अपने परिवार में इसका पालन किया, तब जनता से सहयोग मांगा। इतिहास गवाह है, देश पर जब-जब संकट आता है देश की जनता हमेशा त्याग करती हैं, लेकिन अगर सादगी और बचत की शुरुआत सत्ता और व्यवस्था के शीर्ष स्तर से हो तो उसका संदेश ज्यादा प्रभावी होगा
