अजय शास्त्री (संपादक)
बीसीआर न्यूज़/नई दिल्ली: दिल्ली सरकार को ओबीसी वर्ग के लिए महत्वपूर्ण पहल करनी चाहिए क्योंकि 1993 के बाद अन्य राज्य से दिल्ली में आये ओबीसी वर्ग का प्रमाण पत्र बनने में काफी समस्या आ रही है ऐसा ही एक मामला हमारे संज्ञान में आया है।
मामला यह है कि दिल्ली में बेटे का जाति प्रमाणपत्र बनवाने के लिए पिता ने अप्लाई किया था, मगर पिता का जाति प्रमाणपत्र मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश का वर्ष 1992 का बना होने के कारण शालीमार बाग़ दिल्ली के तहसीलदार साहब ने पिता का जाति प्रमाणपत्र वेरीफाई (सत्यापन) करवाने के लिए मुज़फ्फरनगर भेजा, मगर पिता का जाति प्रमाणपत्र पुराना यानि 1992 का होने के कारण उसका सत्यापन संभव नही हो पाया क्योंकि मुज़फ्फरनगर उत्तरप्रदेश के तहसीलदार का कहना था कि जाति प्रमाणपत्र पुराना होने के कारण सत्यापन करना संभव नही है मगर स्थानीय जांच में यह पाया गया है कि यह व्यक्ति इस गाँव का निवासी था और इसकी यह जाति है।
जाति और निवास स्थान सत्यापित होने के बाद भी शालीमार बाग़ दिल्ली के तहसीलदार साहब ने जाति प्रमाणपत्र नही बनाया और आवेदन पत्र में गलत जानकारी दी गई है ये कारण बताकर आवेदन को रिजेक्ट कर दिया।
जबकि शालीमार बाग़ दिल्ली के तहसीलदार साहब से मुज़फ्फरनगर उत्तरप्रदेश के तहसीलदार की फ़ोन पर बात भी करवा दी और मुज़फ्फरनगर उत्तरप्रदेश के तहसीलदार साहब ने ये साफ़ साफ़ कह दिया कि जाति प्रमाणपत्र पुराना होने के कारण सत्यापन करना संभव नही है मगर स्थानीय जांच में यह पाया गया है कि यह व्यक्ति इस गाँव का निवासी था और इसकी यह जाति है। फिर भी शालीमार बाग़ दिल्ली के तहसीलदार साहब ने 1993 के अधिनियम हवाला देते हुए आवेदन को रिजेक्ट कर दिया है।
क्या अब इस का जाति प्रमाणपत्र नहीं बनेगा ??? दिल्ली सरकार जवाब दें ????
इस सम्बन्ध में दिल्ली सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए और इस अधिनियम को ख़त्म करके पिछड़ा वर्ग की सहायता करने चाहिए।
आपको बता दें कि पिछड़ा वर्ग का जाति प्रमाणपत्र बनवाने के लिए दिल्ली में रहने वाले पिछड़ा वर्ग के लोगों को 1993 के पहले से दिल्ली में निवास के दस्तावेज देने की अनिवार्यता को खत्म कर ने का प्रयास किया गया था।
यह दिल्ली में रहने वाले अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लोगों के लिए बहुत बड़ी खबर है।
अरविंद केजरीवाल सरकार ने उस बाध्यता को खत्म करने का निर्णय लिया था जिसके कारण दिल्ली में दूसरे प्रदेशों से आने वाले ओबीसी वर्ग के लोगों को ओबीसी का प्रमाण पत्र नही बन पाता था।
जिस कारण वे दिल्ली सरकार की नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं ले पाते थे। इसका कारण यह था कि दिल्ली सरकार ने केवल उन्हें ही ओबीसी प्रमाण पत्र निर्गत किये जाने का प्रावधान रखा था जो 1993 के पहले दिल्ली आये थे।
ग़ौरतलब है कि इस संबंध कई आलेख व रिपोर्टें प्रकाशित की जा चुकी हैं कि किस तरह ओबीसी का प्रमाण पत्र नही रहने के कारण दिल्ली में रहने वाले लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस संबंध में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस वी. ईश्वरैया ने भी यह सवाल उठाया था और मांग की थी कि दिल्ली सरकार 1993 के पहले का मूलनिवासी होने के शर्त को या तो खत्म करे या फिर इसे आगे बढ़ाये। उनका विचार था कि दिल्ली देश की राजधानी है और यहां पूरे देश के लोग रहते हैं।
खैर, लंबे समय से उठ रही इस मांग पर बीते 28 सितंबर 2018 को दिल्ली सरकार ने चर्चा की। राज्य सरकार में समाज कल्याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने इस संबंध में एक उच्च स्तरीय बैठक की। उन्होंने बैठक में कहा था कि राज्य सरकार ओबीसी पर लगे इस शर्त को समाप्त करने के पक्ष में है। दिल्ली में रहने वाले ओबीसी वर्ग के लोगों का प्रमाण निर्गत किया जाय। फिर वे 1993 के बाद ही आकर यहां क्यों न बसे हों।
चूंकि यह मामला केंद्र सरकार से भी जुड़ा है। लिहाजा राजेंद्र पाल गौतम ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि वे भारत सरकार के अधिकारियों के साथ समन्वय कर इस मामले का समाधान निकालें ताकि दिल्ली में ओबीसी प्रमाण पत्र के लिए 1993 के पहले का मूलनिवासी दस्तावेज होना अनिवार्य न रहे। उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में भी विचाराधीन है। लिहाजा उन्होंने ओबीसी वर्ग के लोगों का आह्वान भी किया कि वे उपयुक्त मंचों, संगठनों के जरिए इस मांग को उठायें। दिल्ली सरकार उनके साथ है।
बहरहाल, दिल्ली सरकार इस मामले को उठालकर इस पर निर्णय लेती है तो इसके दूरगामी असर होंगे। यदि यह फैसला अमल में लाया जाता है तब निश्चित तौर पर उन लोगों को लाभ मिलेगा जो अन्य प्रदेशों से रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली आये और यही के होकर रह गये। वर्तमान में दिल्ली में ओबीसी वर्ग को प्रमाण पत्र के लिए यह दस्तावेज देना पड़ता है कि वे 1993 के पहले दिल्ली आये थे या बाद में।

केंद्र सरकार व राज्य सरकार को इस विषय पर संज्ञान लेना चाहिए, क्योंकि ये बहुत ही गंभीर मुद्दा है।