March 6, 2026

अजय शास्त्री (संपादक व प्रकाशक)

बीसीआर न्यूज़/मुंबई: विविधताओं से भरे भारत देश में जहां आज सामाजिक समरसता और अपनत्व का भाव धूमिल होता जा रहा है। ऐसे दौर में प्रसिद्ध रंगकर्मी व साहित्यकार सच्चिदानंद जोशी की कहानी ‘कंजक का कंझट’ पर बनी शॉर्ट फिल्म ‘कंजक’ नवरात्रि के दौरान होने होने कन्या पूजन के माध्यम से भारतीयता के मूल को दर्शाती है। युवा फिल्मकार राहुल यादव के सधे हुए निर्देशन में बनी 14 मिनट की इस फिल्म का एक स्पेशल शो हाल ही में दिल्ली के साकेत स्थित निव आर्ट सैंटर में हुआ जिसमें शहर के प्रबुद्ध सिने- प्रेमियों ने भाग लिया।

इस फिल्म में मुख्य भूमिकाएं खुद लेखक सच्चिदानंद जोशी और उनकी पत्नी मालविका जोशी ने निभाई हैं। इनके अतिरिक्त सवलीन कौर, राहुल यादव और सलाब बालक ट्रस्ट के बच्चों ने भी इसमें विभिन्न किरदार निभाए हैं। राहुल यादव फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान पुणे से स्नातक हैं और इस फिल्म में कैमरा, साउंड, संपादन जैसे तकनीकी कामों का जिम्मा उसी संस्थान से निकले काबिल लोगों ने उठाया है जिनकी तकनीकी दक्षता का असर फिल्म में साफ दिखाई देता है।

स्क्रीनिंग के बाद इस फिल्म से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर वहां एक चर्चा भी हुई जिसका संचालन सर्वश्रेष्ठ फिल्म क्रिटिक के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फिल्म समीक्षक दीपक दुआ ने किया। चर्चा के दौरान सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि इस कहानी में भारतीयता के उस मूल की ओर लौटने का प्रयास किया गया है जो यहां की जड़ों में हमेशा से मौजूद था और हमेशा रहेगा। भारत जो कि विभिन्न जातियों, धर्मों और संस्कृतियों का सदियों से सौहार्दपूर्ण निवास रहा है, लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश और सांप्रदायिक संघर्षों ने भारतीय समाज के इस मूल पर चोट करते हुए समरसता के भाव के विघटन का कार्य किया है।

आज जहां भारतीय समाज परंपरा, संस्कृति, जाति और धर्म के आधार पर बंट रहा है ऐसे दौर में यह लघु फिल्म अपने कथानकों के माध्यम से सांप्रदायिक सौहार्द को आधार बनाकर आपसी सहिष्णुता का प्रभावशाली संदेश देती है।

इस फिल्म का हर किरदार अपने अभिनय से कहानी को जीवंतता प्रदान करता है। सच्चिदानंद जोशी और मालविका जोशी ने अपने सजीव और दमदार अभिनय से हिन्दू परिवारों में ‘कंजक’ (कन्या पूजन) के दिन बड़े शहरों में होने वाली आपा-धापी को बड़ी ही सुंदरता से प्रस्तुत किया है। दीदी के किरदार में सवलीन कौर अपने बातूनी और चुलबुली भूमिका से न्याय करती हैं। 14 मिनट की यह फिल्म अंत के 10-15 सेकेंड में अपने पत्ते खोलती है और दर्शकों को एक धीमा झटका देकर कुछ लोगों के पूर्वाग्रह पर जोरदार प्रहार करती हैं। यहीं आकर यह फिल्म सफल हो जाती है। यह राहुल के निर्देशन की खूबी है कि वह कहानी को उसके चरम पर ले जाकर छोड़ते हैं जिसके बाद संत कबीर की लिखी पंक्तियां आकर फिल्म को एक नया आकाश दे पाने में कामयाब रहती हैं।

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