सरदार पटेल की मूर्ति को बनाने में 2989 करोड़ रुपए तो खर्च कर दिए, मगर उन लाखों गरीब बच्चों के बारे में नहीं सोचा जो भूख से मर जाते है

बीसीआर न्यूज़ (अजय शास्त्री/मुंबई): सरदार वल्ल्भभाई पटेल की जयंती के दिन ही उनकी 182 मीटर ऊंची मूर्ति का पीएम मोदी उद्घाटन कर चुके हैं. इस मूर्ति के बारे में सरकार खूब सारी अच्छी-अच्छी बातें कर रही है. कोई इसे दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति होने को लेकर गर्व कर रहा है, तो कोई मान रहा है कि लौह पुरुष को सम्मान देकर सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है. इस मूर्ति के बनने से पर्यटन को बढ़ावा देने और नौकरियां पैदा होने की बातें भी खूब हो रही हैं. सरदार पटेल एक क्रांतिकारी थे, जिनका योगदान भुलाया नहीं जा सकता है, लेकिन जिन लोगों की सेवा करते हुए उन्होंने अपने प्राण तक दाव पर लगा दिए, उन्हीं लोगों की अनदेखी करते हुए पटेल की मूर्ति बना दी गई है. चलिए जानते हैं वो 5 वजहें, जो ये दिखाती हैं कि सरदार पटेल के योगदान के लिए उनकी मूर्ति बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि देना सबसे सही तरीका नहीं है.

सरदार पटेल, मोदी सरकार, गुजरात, भाजपा

सरदार पटेल की मूर्ति को बनाने में कुल 2989 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं.

1- भारी-भरकम लागत

सरदार पटेल की मूर्ति को बनाने में कुल 2989 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं. भारत जैसे देश में, जहां लाखों बच्चे भूख और गरीबी से हर साल मर जाते हैं, उस देश के लिए ये बहुत बड़ी रकम है. इस पैसे से स्कूलों या अस्पतालों की चेन बनाई जा सकती थी, जिन्हें सरदार पटेल का नाम दिया जा सकता था. पटेल के नाम पर इन पैसों का इस्तेमाल करके सड़कों का जाल बिछाया जा सकता था. या फिर उनके नाम पर फूड सिक्योरिटी स्कीम लाकर भी उन्हें श्रद्धांजलि दी जा सकती थी. इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट के अनुसार जितना बजट स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का है, उतने में तो दो नए आईआईटी कैंपस, दो एआईआईएमएस कैंपस, 5 नए स्थायी आईआईएम कैंपस, 5 नए सोलर पावर प्लांट या 6 मंगल ग्रह पर जाने के मिशन किए जा सकते थे.

2- किसानों और आदिवासियों का प्रदर्शन

देखा जाए तो सरदार पटेल की मूर्ति को किसानों और आदिवासियों की जमीन छीनकर बनाना उनके प्रति श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उनका अपमान है. गुजरात में जगह-जगह किसान और आदिवासी इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि उनकी जमीन का उन्हें सही मुआवजा नहीं दिया गया और उनके जीने का सहारा उनकी जमीन उनसे छीन ली गई. कुछ किसानों ने तो उद्घाटन के दिन ही आत्महत्या करने की धमकी भी दी थी, क्योंकि सरदार पटेल के नाम पर बनी सुगर मिल से उनके गन्ने का भुगतान उन्हें नहीं किया जा रहा है. जिन पोस्टर के जरिए पटेल के प्रोजेक्ट का विज्ञापन किया जा रहा था, उन्हें भी आदिवासियों ने फाड़ दिया. तो फिर सराकर ने पोस्टर ही बदल दिया और उसमें बिरसा मुंडा को भी जगह दे दी, ताकि आदिवासी अपने हीरो के पोस्टर ना फाड़ें और पटेल का विज्ञापन भी हो सके. 30 अक्टूबर 2016 को बहुत सारे आदिवासी नेता और कार्यकर्ताओं को हिरासत में भी लिया गया था. जहां एक ओर सरदार पटेल का सपने एक मजबूत भारत बनाने का था, वहीं सरकार देश के ही नागरिकों को जेल में डाल रही है.

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भारत के इतने महान क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी व्यक्ति की प्रतिमा बनाने के लिए चीन की मदद लेनी पड़ी

3- पर्यावरण को नुकसान

सरदार पटेल की प्रतिमा को नर्मदा नदी के इकोलॉजिकल सेंसिटिव जोन में बनाया गया है, जिसे पर्यावरणविद जियोलॉजिकल फॉल्ट लाइन कहते हैं. यह मूर्ति शूलपानेश्वर सैंक्चुरी के बेहद समीप है. ऐसे में यहां निर्माण कार्यों और पर्यटन गतिविधियों से इकोलॉजिकल सेंसिटिव जोन को नुकसान पहुंच सकता है. जब से इस प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई है, तब से ही कई सामाजिक कार्यकर्ता इसे लेकर आवाज उठाते रहे हैं, कि यह प्रोजेक्ट पर्यावरण के नियमों का उल्लंघन कर के शुरू किया गया है.

4- मेड इन चाइना

भारत के इतने महान क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी व्यक्ति की प्रतिमा बनाने के लिए चीन की मदद लेनी पड़ी. ये सच है कि इस मूर्ति को भारत में ही डिजाइन किया गया है, लेकिन कांसे के जो 553 पैनल इसमें लगाए गए हैं, वो मेड इन चाइना हैं. दरअसल, भारत में कोई कंपनी ही नहीं है, जो इतने बड़े प्रोजेक्ट को पैनल उपलब्ध करा पाती, इसलिए इन्हें चीन से मंगाया गया. बजाय इसके कि सरकार किसी भारतीय कंपनी को इस काम के लिए न्योता देती या किसी के सामने आने का इंतजार करती, उसने ये काम चीन को आउटसोर्स कर दिया. आखिर उद्घाटन करने की इतनी भी क्या जल्दी थी कि चीन से मदद लेनी पड़ी? हो सकता है कि सरकार का फोकस राष्ट्रवाद से अधिक चुनाव पर हो.

5- प्रतिस्पर्धा

मेमोरियल और मॉन्यूमेंट बनाकर लोगों की नजरों में चढ़ जाने की एक स्पर्धा सी चल पड़ी है. पहले ही महाराष्ट्र में भी बीच समुंदर में शिवाजी महाराज की काफी महंगी मूर्ति बनाई जा रही है.

बेशक कोई इस बात को नहीं मानेगा, लेकिन पटेल को अपनी खुद की सबसे ऊंची मूर्ति देखने से अधिक खुशी इस बात से होती कि देश के लोगों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवाएं मिलें. लौह पुरुष को महज एक कांसे की मूरत बनाने के अलावा भी कई अन्य तरीकों से श्रद्धांजलि दी जा सकती थी.